कौन सुनेगा प्रवासी मजदूर (Migrant Labour ) की दर्द भरी कहानी ।
जोहार
आज मैं आप लोगों को कुछ शीर्षक विषय पर आप सबों का ध्यान आकर्षित करवाना चाहूंगा ।
आदिम डिजिटल मीडिया,भारत//शंकर मार्डी के कलम से।।
भारत देश में 80 के दशक में हम सब छात्र IIT, Marine Engineering एवं अन्य प्रवेश परिक्षाओं हेतु मुख्यत जुलाई अगस्त माह में कलकत्ता जाते थे। उस दौरान देश के प्रथम Metro रेल का काम जोरों में था तथा जिसका संचालन 1984 में प्रारंभ किया गया। अब तक इस मेट्रो रेल सुविधा का उपयोग करोंड़ों लोगों ने कर लिया होगा।
एकबार ऐसे ही परीक्षा के समाप्ति पर, मुझे कुछ मजदूर संथाली भाषा में बातचीत करते मिले तो मैंने भी जिज्ञासा वश उनसे पूछा कि आप सब कहां के रहने वाले हैं और गांव छोड़ विपरीत परिस्थितियों में रहने क्यों आऐं हैं। बातचीत से ज्ञात हुआ कि वे सब पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा एवं पुरूलिया जिले से करीब करीब 15 से 20 गांवों के लोग रोजगार हेतु सपरिवार आये हैं।
दूसरी घटना हमारे ही परिवार का है। 26 अगस्त 2000 को 19 साल का भतीजा ऊधमपुर के पहाड़ में सुरंग खोदने के क्रम में शहीद हो गया। पढ़ाई में मन नहीं लगने के वजह से, दोस्तों संग भाग कर पैसे कमाने चला गया था। एक होनहार जीवन का अंत, अंजान जगह और बेपरवाह लोगों के बीच गुमनामी में बिखर गया। हमें पार्थिव शरीर का अंतिम दर्शन भी नसीब नहीं हुआ।
न जाने ऐसे कितने सच्ची घटनाएं झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़िसा, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, त्रिपुरा, बंगला देश, नेपाल एवं अन्य जनजाति, निम्न तबके बहुल क्षेत्रों में भरे पड़े होंगे।
हमारे नजरिए में प्रवासी मजदूर ही सही मायने में राष्ट्र-निर्माता हैं। क्योंकि इनका जीवन, पसीना और मेहनत हर उस बड़े प्रोजेक्ट (Project) में लगा हुआ होता है जिनपर देश गर्व करता है और विश्व में अपना पीठ थपथपाता है। इनमें चाहे मेट्रो रेल हों, बड़े बड़े डैम हों, हवाई अड्डे हों,18 लैन सड़कें हों, खदान हों, बहुमंजिली इमारत हों, और भी ऐसे अनेकों कठिन कार्य हों।
मुझे नहीं लगता है कि इनके मेहनत से निर्मित सुविधाएं उपयोग करते वक्त हम इन अंजान राष्ट्र निर्माताओं के प्रति आभार प्रकट करते होंगे। अपने मेहनत एवं जिन्दगी को दांव में लगा कर, गांव परिवार छोड़ कर ये योद्धा जिन बहुमंजिली इमारतों को अरबों खरबों के मुल्य का बनाता है, उन्हें समाज को अदार देना चाहिए।
26/27 मार्च को दिल्ली के आनंद विहार में एवं 14 अप्रैल 2020 को मुम्बई के रेलवे स्टेशन में इन योद्धाओं के भीड़ एवं घर जाने की जेदोजहाद को देख, मन विचलित हो उठा।
मन ही मन एक सवाल उठता रहा कि अपने प्रदेश या गांव में संसाधनों का इतना कमी आ गई है क्या कि हमारे लाखों राष्ट्र निर्माताओं को ऐसे लाचारी और बेबसी का छण देखना पड़े ???????
आप अपनी विचार हमसे साझा कर सकते हैं और आपस में वैचारिक रूप से जुड़ सकते हैं ।
अधिक जानकारी के लिए दिये हुए Link पर क्लिक करे। https://adimdigital.in/
आपको जानकारी कैसे लगा कमेंट करके हमें बताएं अच्छा लगा तो शेयर जरूर कीजिएगा।
Posted by- Sukumar Soren
आज मैं आप लोगों को कुछ शीर्षक विषय पर आप सबों का ध्यान आकर्षित करवाना चाहूंगा ।
आदिम डिजिटल मीडिया,भारत//शंकर मार्डी के कलम से।।
भारत देश में 80 के दशक में हम सब छात्र IIT, Marine Engineering एवं अन्य प्रवेश परिक्षाओं हेतु मुख्यत जुलाई अगस्त माह में कलकत्ता जाते थे। उस दौरान देश के प्रथम Metro रेल का काम जोरों में था तथा जिसका संचालन 1984 में प्रारंभ किया गया। अब तक इस मेट्रो रेल सुविधा का उपयोग करोंड़ों लोगों ने कर लिया होगा।
एकबार ऐसे ही परीक्षा के समाप्ति पर, मुझे कुछ मजदूर संथाली भाषा में बातचीत करते मिले तो मैंने भी जिज्ञासा वश उनसे पूछा कि आप सब कहां के रहने वाले हैं और गांव छोड़ विपरीत परिस्थितियों में रहने क्यों आऐं हैं। बातचीत से ज्ञात हुआ कि वे सब पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा एवं पुरूलिया जिले से करीब करीब 15 से 20 गांवों के लोग रोजगार हेतु सपरिवार आये हैं।
दूसरी घटना हमारे ही परिवार का है। 26 अगस्त 2000 को 19 साल का भतीजा ऊधमपुर के पहाड़ में सुरंग खोदने के क्रम में शहीद हो गया। पढ़ाई में मन नहीं लगने के वजह से, दोस्तों संग भाग कर पैसे कमाने चला गया था। एक होनहार जीवन का अंत, अंजान जगह और बेपरवाह लोगों के बीच गुमनामी में बिखर गया। हमें पार्थिव शरीर का अंतिम दर्शन भी नसीब नहीं हुआ।
हमारे नजरिए में प्रवासी मजदूर ही सही मायने में राष्ट्र-निर्माता हैं। क्योंकि इनका जीवन, पसीना और मेहनत हर उस बड़े प्रोजेक्ट (Project) में लगा हुआ होता है जिनपर देश गर्व करता है और विश्व में अपना पीठ थपथपाता है। इनमें चाहे मेट्रो रेल हों, बड़े बड़े डैम हों, हवाई अड्डे हों,18 लैन सड़कें हों, खदान हों, बहुमंजिली इमारत हों, और भी ऐसे अनेकों कठिन कार्य हों।
मुझे नहीं लगता है कि इनके मेहनत से निर्मित सुविधाएं उपयोग करते वक्त हम इन अंजान राष्ट्र निर्माताओं के प्रति आभार प्रकट करते होंगे। अपने मेहनत एवं जिन्दगी को दांव में लगा कर, गांव परिवार छोड़ कर ये योद्धा जिन बहुमंजिली इमारतों को अरबों खरबों के मुल्य का बनाता है, उन्हें समाज को अदार देना चाहिए।
26/27 मार्च को दिल्ली के आनंद विहार में एवं 14 अप्रैल 2020 को मुम्बई के रेलवे स्टेशन में इन योद्धाओं के भीड़ एवं घर जाने की जेदोजहाद को देख, मन विचलित हो उठा।
मन ही मन एक सवाल उठता रहा कि अपने प्रदेश या गांव में संसाधनों का इतना कमी आ गई है क्या कि हमारे लाखों राष्ट्र निर्माताओं को ऐसे लाचारी और बेबसी का छण देखना पड़े ???????
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Posted by- Sukumar Soren



Adi napyi...
ReplyDeleteAdi Adi gomkey।।
ReplyDeleteAdi napyi ge ho......
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