आजादी क्या होती है उसका अहसास एक गुलाम ही कर सकता है ।
हुल जोहार
1510 ई. मे जब अफ्रीकी अश्वेत दासों से लदा पहला जहाज नई दुनिया (अमेरिका ) पहुँचा तो गुलामी के इतिहास में एक नया मोड़ आया। मूलनिवासी दास कभी कभी अपनी विद्रोही गतिविधियों के कारण श्वेत महा प्रभुओं का सरदर्द बन जाते थे और साथ ही स्पेन एवं पुर्तगाल के राजा तथा धर्मगुरु भी उन दासों के प्रति सहिष्णुता बरतने की चर्चा करने लग जाते थे। मूलनिवासी दासों की तुलना में ये नए अश्वेत दास अधिक आज्ञाकारी तथा कठोर परिश्रमी थे जिसका प्रधान कारण इन नीग्रो का अपनी अफ्रीकी मातृभूमि से दूर सात समूद्र पार रहना था। अत: उस युग मे अश्वेत गुलामों की माँग बढ़ने लगी।
अफ्रीका के आदिवासी कबीला के अश्वेत लोगो को दास बनाने के लिए पकड़े जाने लगे और उन्हें जंजीरों से बांध कर मिस्र , रोम ,अन्य यूरोपियन देशो में एवं अमेरिका जैसे देशों में उन पकड़े गए अश्वेत लोगो को गुलामो की तरह भेजा जाने लगा।
फलत: अश्वेत गुलामों का आयात इतना बढ़ा कि शीघ्र ही पश्चिमी द्वीपसमूहों में उनका बहुमत हो गया। लालची यूरोपीय शक्तियों के तत्वावधान में दास व्यापार की निजी कंपनियों में ऐसी घोर प्रतिस्पर्धा चली कि 18वीं सदी के प्रारंभ तक नीग्रो दास व्यापार पराकाष्ठा पर पहुँच गया। अंग्रेज तो इस काम में रानी एलिजाबेथ के काल में ही निपुण हो चुके थे क्योंकि रेले, गिलबर्ट, हाकिंस तथा ड्रेक जैसे व्यक्ति अपहरण, लूटमार आदि तरीकों से दासव्यापार चलाकर इंग्लैंड को समृद्ध बना रहे थे।
उसी दौर की एक घटना को एक नाट्य रूप से रहा हूँ ,
एक व्यक्ति को कोई कितने भी जंजीरों से जकड़ दे लेकिन किसी व्यक्ति के अंदर के चरित्र को कोई भी गुलाम नहीं बन सकता।
अमेरिका के एक बाजार में कुछ दिन पहले ही अश्वेत गुलामो का एक खेप आया था। गुलामो के विक्रेताओं का प्रमुख ने प्रातः ही क्रय विक्रय के लिए पकड़े गए काले गुलामो को बाज़ार में ले आया था। जंजीरों से जकड़े सभी गुलाम एक कतार में अपने अपने बारी के लिए इतजार कर रहे थे। गुलामो के खरीददारों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। बड़े पारखी नजर से गुलामो की परख की जा रही थी।
लेकिन अनायास ही खरीदारों की नजर एक ऐसे गुलाम पर पड़ जाता था जिसे किसी जंजीर से बांधा नहीं गया था और उसे अन्य गुलामो से अलग ही रख गया था। देखने में वह भी उन्ही अन्य गुलामो की तरह दिखता था लेकिन उसके व्यक्तित्व और व्यवहार में कुछ अलग था वह गुलाम। अपने सर को उठाकर अकड़ के साथ वह चुपचाप कोने में खड़ा रहता था। और आने जाने वालो को देखता रहता था ।
एक खरीददार से रहा ना गया उसने गुलामो के प्रमुख से पूछा -
श्रीमान, क्या यह गुलाम नहीं है ?
गुलाम के प्रमुख ने कहाँ - जी हाँ , महोदय यह एक गुलाम ही है।
खरीददार ने फिर पूछा -
फिर यह गुलाम अन्य गुलामो से अलग क्यों रखा गया है ?
इसे जंजीर से क्यों नहीं बांधा गया ?
यह इतना अकड़ कर क्यों रहता है ?
गुलामो के प्रमुख ने जवाब दिया – जी जनाब , यह गुलाम अन्य गुलामो की तरह ही है , कुछ दिन पहले ही अफ्रीका के एक आदिवासी कबीला से पकड़ कर लाया गया है। जिस कबीला से इसे लाया गया है उस कबीला के सरदार लड़ते लड़ते मारा गया , यह गुलाम उसी कबीला के मारे गए सरदार का बेटा है।
यह गुलाम लड़का जंजीरों में बांधने के बावजूद अपने ' रॉयल करेक्टर ' को छोड़ा नहीं , इसे पता ही नहीं है की एक गुलाम है !
'रॉयल करेक्टर' तो इसके व्यवहार में साफ दिखता है इस लिए हम इसे अन्य गुलामो की तरह कतार में इसे नहीं रखते क्यों की हम इसे बेचना नहीं चाहते।
वह गुलाम युवक जो कबीले के सरदार का बेटा था अपने घर और परिवार से हजारों मिल दुर अकेला खामोश अपने गहरे नेत्रो से मार्ग मे आते जाते हर किसी को देखता रहता जैसे किसी अपनो की तलाश हो।
आजादी क्या होती है उसका अहसास एक गुलाम ही कर सकता है । आजादी बिना कीमत चुकाये नही मिलता ।
अश्वेत लोगों ने अपनी आजादी के लिये एक लम्बा संघर्ष किये ।
भारत के लोगों ने भी विदेशी शासकों की गुलामीगीरी से आजादी पाने के लिये लम्बा संघर्ष करते रहे । परंतु अभी भी हमारे समाज मे कई तरह की गुलामीगिरी है जिनके जंजीरों को तोड़ना अभी बाकी है ।
- राजू मुर्मू
1510 ई. मे जब अफ्रीकी अश्वेत दासों से लदा पहला जहाज नई दुनिया (अमेरिका ) पहुँचा तो गुलामी के इतिहास में एक नया मोड़ आया। मूलनिवासी दास कभी कभी अपनी विद्रोही गतिविधियों के कारण श्वेत महा प्रभुओं का सरदर्द बन जाते थे और साथ ही स्पेन एवं पुर्तगाल के राजा तथा धर्मगुरु भी उन दासों के प्रति सहिष्णुता बरतने की चर्चा करने लग जाते थे। मूलनिवासी दासों की तुलना में ये नए अश्वेत दास अधिक आज्ञाकारी तथा कठोर परिश्रमी थे जिसका प्रधान कारण इन नीग्रो का अपनी अफ्रीकी मातृभूमि से दूर सात समूद्र पार रहना था। अत: उस युग मे अश्वेत गुलामों की माँग बढ़ने लगी।
अफ्रीका के आदिवासी कबीला के अश्वेत लोगो को दास बनाने के लिए पकड़े जाने लगे और उन्हें जंजीरों से बांध कर मिस्र , रोम ,अन्य यूरोपियन देशो में एवं अमेरिका जैसे देशों में उन पकड़े गए अश्वेत लोगो को गुलामो की तरह भेजा जाने लगा।
फलत: अश्वेत गुलामों का आयात इतना बढ़ा कि शीघ्र ही पश्चिमी द्वीपसमूहों में उनका बहुमत हो गया। लालची यूरोपीय शक्तियों के तत्वावधान में दास व्यापार की निजी कंपनियों में ऐसी घोर प्रतिस्पर्धा चली कि 18वीं सदी के प्रारंभ तक नीग्रो दास व्यापार पराकाष्ठा पर पहुँच गया। अंग्रेज तो इस काम में रानी एलिजाबेथ के काल में ही निपुण हो चुके थे क्योंकि रेले, गिलबर्ट, हाकिंस तथा ड्रेक जैसे व्यक्ति अपहरण, लूटमार आदि तरीकों से दासव्यापार चलाकर इंग्लैंड को समृद्ध बना रहे थे।
उसी दौर की एक घटना को एक नाट्य रूप से रहा हूँ ,
एक व्यक्ति को कोई कितने भी जंजीरों से जकड़ दे लेकिन किसी व्यक्ति के अंदर के चरित्र को कोई भी गुलाम नहीं बन सकता।
अमेरिका के एक बाजार में कुछ दिन पहले ही अश्वेत गुलामो का एक खेप आया था। गुलामो के विक्रेताओं का प्रमुख ने प्रातः ही क्रय विक्रय के लिए पकड़े गए काले गुलामो को बाज़ार में ले आया था। जंजीरों से जकड़े सभी गुलाम एक कतार में अपने अपने बारी के लिए इतजार कर रहे थे। गुलामो के खरीददारों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। बड़े पारखी नजर से गुलामो की परख की जा रही थी।
लेकिन अनायास ही खरीदारों की नजर एक ऐसे गुलाम पर पड़ जाता था जिसे किसी जंजीर से बांधा नहीं गया था और उसे अन्य गुलामो से अलग ही रख गया था। देखने में वह भी उन्ही अन्य गुलामो की तरह दिखता था लेकिन उसके व्यक्तित्व और व्यवहार में कुछ अलग था वह गुलाम। अपने सर को उठाकर अकड़ के साथ वह चुपचाप कोने में खड़ा रहता था। और आने जाने वालो को देखता रहता था ।
एक खरीददार से रहा ना गया उसने गुलामो के प्रमुख से पूछा -
श्रीमान, क्या यह गुलाम नहीं है ?
गुलाम के प्रमुख ने कहाँ - जी हाँ , महोदय यह एक गुलाम ही है।
खरीददार ने फिर पूछा -
फिर यह गुलाम अन्य गुलामो से अलग क्यों रखा गया है ?
इसे जंजीर से क्यों नहीं बांधा गया ?
यह इतना अकड़ कर क्यों रहता है ?
गुलामो के प्रमुख ने जवाब दिया – जी जनाब , यह गुलाम अन्य गुलामो की तरह ही है , कुछ दिन पहले ही अफ्रीका के एक आदिवासी कबीला से पकड़ कर लाया गया है। जिस कबीला से इसे लाया गया है उस कबीला के सरदार लड़ते लड़ते मारा गया , यह गुलाम उसी कबीला के मारे गए सरदार का बेटा है।
यह गुलाम लड़का जंजीरों में बांधने के बावजूद अपने ' रॉयल करेक्टर ' को छोड़ा नहीं , इसे पता ही नहीं है की एक गुलाम है !
'रॉयल करेक्टर' तो इसके व्यवहार में साफ दिखता है इस लिए हम इसे अन्य गुलामो की तरह कतार में इसे नहीं रखते क्यों की हम इसे बेचना नहीं चाहते।
वह गुलाम युवक जो कबीले के सरदार का बेटा था अपने घर और परिवार से हजारों मिल दुर अकेला खामोश अपने गहरे नेत्रो से मार्ग मे आते जाते हर किसी को देखता रहता जैसे किसी अपनो की तलाश हो।
आजादी क्या होती है उसका अहसास एक गुलाम ही कर सकता है । आजादी बिना कीमत चुकाये नही मिलता ।
अश्वेत लोगों ने अपनी आजादी के लिये एक लम्बा संघर्ष किये ।
भारत के लोगों ने भी विदेशी शासकों की गुलामीगीरी से आजादी पाने के लिये लम्बा संघर्ष करते रहे । परंतु अभी भी हमारे समाज मे कई तरह की गुलामीगिरी है जिनके जंजीरों को तोड़ना अभी बाकी है ।
- राजू मुर्मू

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